तीर कमान (वासु सोनी)। अब ये क्या सुन लिया! कुछ पढ़े लिखे और प्रमोटेड साहबों को अपनी बड़ाई ज्यादा पसंद है। जिले सहित नगर में इन दिनों विकास की गंगा जो है वो नाले में तब्दील हो गई है। अब कुछ छपने छापने वाले लगातार विकास के नाले की ओर ध्यान आकर्षण करना चाह रहे है लेकिन वो सुना है “तुम बोले और मैं उड़ चला…” कुछ याद आया क्या? इसी कहानी के पात्र की तरह नगर और जिले के साहब शायद बन चुके हैं? अब बिचारे कर भी क्या सकते हैं? कुछ करो तो दिक्कत, ना करो तो दिक्कत? ऊपर से ये छपने छापने वाले. जिंदगी अबूझमाड़ के जंगल जैसी हो गई है… इसीलिए तो करना और कहना पड़ता है : राम नाम जपना, पराया….अपना! बाकी तो साहब की माया है। अच्छा साहबों के गुणगान में मै भूल गया कि नगर में इन दिनों कब्जा धारियों की बाढ़ आ गई है..राम नाम और पराया…अपना के चक्कर में रोड सिकुड़ गई है… लेकिन साहब को उससे क्या मतलब पराया.….अपना तो आ रहा ना, बाकी प्रभु की इच्छा? अब तो बेरियर से लेकर स्टेशन तक रोड ना भी रहे तो साहब को टेंशन थोड़ी ना होगी! कई बार साहब जेसीबी लेकर भी पहुंच जाते है लेकिन वहां भी जनता माई बाप है कहने वाले भी पहुंच जाते है। अब साहब करे भी तो क्या, इससे अच्छा है कि कार्यालय की कुर्सियां ही अच्छी है… यही से राम नाम जपो बाकी अपना काम बनता, तो ….. जाए जनता?

