
वासु सोनी चांपा। एक ओर लायंस चौक के पास लगे लाइट बोर्ड के बाद अब परशुराम चौक के पास खम्भों में लगे लाइट बोर्ड दुर्घटना को आमंत्रण दे रहे है? वही जिले के सभी उच्च अधिकारी रोजाना उस चौक से गुजरते है लेकिन उन्हें वह दिख जाए ऐसा सम्भव नहीं? मजे की बात तो यह है रोजाना कोई ना कोई उस लाइट बोर्ड से टकरा रहा होगा लेकिन किसी ने शिकायत करने की जहमत नहीं उठाई, शिकायत तो हमारी भी नहीं लेकिन जब तक किसी की मौत ना हो जाए नगर और जिले के अधिकारी शायद जाग जाये। लाइटबोर्ड खंभों से लगभग दोनों ओर डेढ़ से दो फीट तक बाहर है लेकिन यह अधिकारियों को दिखता ही नहीं है। सम्भवतः डेढ़ से दो फीट खंभे से बाहर निकलना आम बात है अधिकारियों का मानना होता है कि इतने में दुर्घटना हो ही नहीं सकती? शायद अधिकारियों की आंखों में कुछ बड़ा देखने और बड़ा सोचने की उम्मीद कुछ ज्यादा ही रहती है?
अधिकारियों के पास नहीं समय?
नगर की दुर्दशा को लेकर यही लगता है कि अधिकारी और कर्मचारी सिर्फ अपने ही बारे में सोचते रहते है। उन्हें जनता और जनहित से कोई लेना देना नहीं रहता। वही अधिकारी और कर्मचारियों के पास समय भी नहीं रहता। जिसके कारण नगर की जनता का कार्य कई महीनों या सालों अटका पड़ा है। वही ठेकेदार और चहेते लोगों का काम बड़ी आसानी से हो जाता है।
बहरहाल अधिकारी और कर्मचारियों की मनमानी का खामियाजा नगर की जनता और जनहित कार्य को भुगतना पड़ रहा है। एसडीएम कार्यालय, तहसील कार्यालय और नगर पालिका कार्यालय की बात करे तो ना ही किसी अधिकार के पास और ना ही किसी कर्मचारी के पास समय हो कि वे इसकी जांच विभाग के नियम अनुसार कर सकें, उन्हें जनता की ओर से जब तक शिकायत ना मिले तब कोई भी कार्रवाई नहीं करते? खुद से जांच करने जाने के लिए विभाग के नियमों में कोई बिंदु ही शायद नहीं दिया गया है, जिसका फायदा उन्हें आसानी से मिल जा रहा होगा? अब देखना यह है कार्रवाई होगी भी या नही?


