
वासु सोनी चांपा। नगर का सबसे बड़ा रामबांधा तालाब का कायाकल्प में लगभग 9 करोड़ का खर्चा किया गया था, लेकिन 9 करोड़ खर्च करने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। वर्तमान समय में जिले और नगर के अधिकारी आम जनता की राय लेकर अपने मर्जी से काम कर रहे है। क्योंकि जनता से राय नहीं लेंगे तो उच्च अधिकारियों को या जवाब देंगे? इसलिए राय लेकर दस्तावेज तैयार कर उच्च अधिकारियों को भेज दिया जाता है। जिससे किसी भी कार्य को लेकर आम जनता की रायशुमारी दर्शा दी जाती है बाकी रही बात कार्य की तो अधिकारी अपने चहेतो और जिनसे ज्यादा लाभ मिले उन्हें कार्य सौंप देते है।
अब बात करते है नगर के सबसे बड़े तालाब रामबांधा की, क्योंकि तालाब की साफ सफाई का जिम्मा किसी अधिकारी का नहीं है, ऐसा हम नहीं बल्कि खुद अधिकारी कहते फिरते हैं। वहीं नियमों के बारे में पूछने पर किसी भी अधिकारी और कर्मचारी के पास कोई दस्तावेज नहीं रहता। क्योंकि नियमों का दस्तावेज देने पर अधिकारी और कर्मचारियों की पोल खुल जाती है। नगर का कोई भी अधिकारी कर्मचारी नियमों की किताब को एक तरफ रखकर सारे कार्यों का वारा न्यारा करते नजर आ रहे है।
सिर्फ मीटिंग ही लेते रहेंगे अधिकारी?
एक ओर कई वर्षों से नगर की व्यवस्था धूल खा रही है तो वहीं अधिकारी सिर्फ मीटिंग ही ले रहे है। अब उन्हें कौन बताए कि साहब काम भी करवाना होता है। हफ्ते में 5 दिन काम का होता है उसमें भी 5 दिन के कई दिन सिर्फ मीटिंग में ही निकल जा रहा है। जिस दिन अधिकारियों की मीटिंग होती है उस दिन कर्मचारियों की छुट्टी मानी जा सकती है। लेकिन नगर की जनता का क्या? नगर की व्यवस्था के बारे में अधिकारी आखिर कब सोचेंगे? वहीं। अधिकारियों से मिलने पर भी वे व्यस्त नजर आते है। आखिर जिले और नगर के अधिकारी काम क्या कर रहे है, ये समझ से परे है। वैसे भी लाखों सैलरी वाले को नगर और उसकी जनता से कोई लेना देना नहीं होता। शिकायत है तो कार्रवाई, नहीं तो आराम है भाई, वाली कहावत चरितार्थ होती है।
बहरहाल अभी जिले और नगर के अधिकारी बहुत बड़े बड़े जनहित के कार्यों में व्यस्त है, इसी वजह से उन्हें समय नहीं मिल पा रहा, शायद इसी वजह से नगर के रामबांधा सहित नई कार्यों के बारे में विचार करने के लिए उन्हें समय नहीं मिल पा रहा होगा। अब तो आम जनता भी कह रही कि निविदा का खेल चल रहा होगा?

