यौन उत्पीड़न मामले में सुप्रीम कोर्ट का तर्क, कहा- पीड़िता का चिल्लाना, शारीरिक चोट लगना महत्वपूर्ण नहीं…

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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि शारीरिक चोटों का न होना यौन उत्पीड़न के मामले में अपराध नहीं होता है. देश की सर्वोच्च अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़िता को शोर मचाना या चिल्लाना भी जरूरी नहीं है. कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित की प्रतिक्रिया विभिन्न परिस्थितियों पर निर्भर करती है. अदालत ने यह भी कहा कि यौन उत्पीड़न से जुड़े सामाजिक कलंक और भय पीड़िता की ओर से घटना को उजागर करने में महत्वपूर्ण बाधाएं उत्पन्न करते हैं.

न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय और एसवीएन भट्टि की बेंच ने कहा, “यह एक सामान्य मिथक है कि यौन उत्पीड़न से शारीरिक चोटें होनी चाहिए. पीड़िता विभिन्न तरीकों से मानसिक आघात का सामना करते हैं. भय, आघात, सामाजिक कलंक, या असहायता जैसी भावनाओं से वह प्रभावित हो सकती है. यह न तो वास्तविक है और न ही उचित है कि हम हर केस में समान प्रतिक्रिया की उम्मीद करें. यौन उत्पीड़न से जुड़ा कलंक अक्सर महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण बाधाएं पैदा करता है, जिससे उनके लिए घटना को दूसरों से साझा करना मुश्किल हो जाता है.“

अपने फैसले में अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के “हैंडबुक ऑन जेंडर स्टिरियोटाइप्स (2023)” का हवाला देते हुए कहा, “अलग-अलग लोग आघातपूर्ण घटनाओं पर अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं.” उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति अपने माता-पिता की मृत्यु पर सार्वजनिक रूप से रो सकता है, जबकि दूसरा व्यक्ति ऐसी स्थिति में सार्वजनिक रूप से कोई भावना नहीं व्यक्त कर सकता है. इसी तरह, एक महिला का यौन उत्पीड़न या बलात्कार पर प्रतिक्रिया उसके व्यक्तिगत लक्षणों पर निर्भर कर सकती है; इस मामले में कोई एक सही या उचित उपाय नहीं है.

आरोपी की सजा निरस्त

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 29 मार्च 2013 को आरोपी दलिप कुमार उर्फ डली ने आईपीसी की धाराओं 363 और 366-A के तहत एक मामले में आरोपी को दोषी ठहराया, जिसमें एक लड़की को कथित रूप से अपहरण कर शादी के लिए ले जाने का आरोप लगाया गया था.

1998 में दर्ज की गई FIR में पहले आरोपी का नाम नहीं था, लेकिन बाद में उसे धारा 363, 366-A, 366, 376, 149 और 368 के तहत आरोपित किया गया. सत्र अदालत ने आरोपी को गंभीर आरोपों से मुक्त कर दिया, लेकिन दलिप कुमार और एक अन्य आरोपी को धारा 363 और 366-A के तहत दोषी ठहराया.

पीड़िता की गवाही पर जोर

बेंच ने कहा कि पीड़िता की गवाही सबसे महत्वपूर्ण सबूत थी. पीड़िता ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में स्पष्ट रूप से कहा कि उसने आरोपी के साथ स्वेच्छा से जाने का निर्णय लिया था और उसके पिता ने जाति के आधार पर उसकी शादी को नकार दिया था. पीड़िता की छोटी बहन सरिता ने बताया कि पीड़िता ने आरोपी के साथ स्कूल जाते देखा था, लेकिन उसे गवाही में पेश नहीं किया गया था.

साथ ही, अदालत ने बताया कि एफआईआर 18 मार्च 1998 को दर्ज होने के बाद अगले दिन 19 मार्च को शाम 7 बजे दर्ज की गई, जबकि घटना 3:00 बजे हुई थी.

अदालत ने मेडिकल साक्ष्य भी लिया. डॉक्टर ने पीड़िता को 16 से 18 वर्ष की आयु बताई और उसे कोई शारीरिक चोट या सूजन नहीं मिली. डॉक्टर ने कहा कि पीड़िता शारीरिक रूप से सामान्य थी और कोई यौन उत्पीड़न का सबूत नहीं था. “साक्ष्य से यह स्पष्ट होता है कि इस मामले में धारा 366-A के तहत अपहरण का आरोप लगाने के लिए कोई आधार नहीं था, इसलिए आरोपी की सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता.”

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