तीर कमान (वासु सोनी)। आखिर ये सूचना का अधिकार किसे दूं। अब ये नया जंजाल कैसे? चलिए बताते हैं जिले का बड़ा सरकारी कार्यालय है जहां जिले के सभी अफसर बैठते हैं जनता की तकलीफंे सुनने, जिनका काम वहां के कर्मचारी निपटाते हैं। अब उन कर्मचारियों को ये भी नहीं मालूम की कहां, कैसे, कब, किसे और क्या देना है। हुआ यूं कि एक आवेदक जनसूचना अधिकार के तहत आवेदन ले पहूंचा, अब आवेदक खाने पीने वाले डिपार्टमेंट में जा पहुंचा, कि वहीं का मामला है। लेकिन वहां बैठी मैडम ने तो जिद पकड़ ली, हमारे यहां इसका कोई कागज है ही नहीं, आवेदन ने भी पूछा कहां मिलेगा, तो बोल पड़ी बड़े साहब के टेबल में आता है वहीं मिलेगा। आवेदक ने अपना आवेदन उठाया और चल पड़े बड़े साहब के कर्मचारी जनसूचना शाखा के पास, कर्मचारी ने आवेदन देखते ही कहा ये उसी डिपार्टमेंट का है जहां का आपने लिखा है, आवेदक ने भी कहा हां वही लिखा था, आवेदक ने कहां वहां बैठी मैडम ने भेजा है और कहा है वहीं मिलेगा, हमारे शाखा में नहीं आता। पहले वहीं आता है। अब जनसूचना शाखा के कर्मचारी ने भी बांहे तानी और पहुंच गया खाने पीने वाला शाखा। कर्मचारियों में बातों की छोटी जंग चली और फिर आवेदक के साथ ढूंढने निकले कहां दिया जाए आवेदन? लेकिन आखिर आवेदक ने भी पूछा आखिर किसे दूं आवेदन क्या सीधे डाक से कलेक्टर को ही भेज दूं क्या? उस पर तपाक से जनसूचना शाखा के कर्मचारी ने कहा हां, आप सही कह रहे हैं, सीधे डाक से कलेक्टर को ही भेज दीजिए, उत्तर मिल जाएगा। तो ये राम कहानी जांजगीर-चांपा जिले के कलेक्टर कार्यालय की है जहां आवेदक एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे पर जनसूचना अधिकार के तहत अपनी आवेदन लगाने भटकते रहा। अंततः आवेदक को यही जवाब मिला कि डाक के माध्यम से सीधे कलेक्टर को ही भेज दो…आखिर ये कैसा कार्यालय जहां कर्मचारियों को ही जानकारी नहीं कि सूचना का अधिकार आवेदन किस प्रक्रिया से और कैसे लें, जिससे यही प्रतीत होता है कि जांजगीर कलेक्टर कार्यालय के कर्मचारी सिर्फ अपनी रोटी ही सेंकना जानते है उन्हें जनता के काम से कोई सरोकार नहीं है।
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