पार्षद निधि का उपयोग या दुरुपयोग, जिले सहित नगर में वार्डो की स्थिति बद से बदतर, निकाय चुनाव में प्रत्याशियों के वादों का दौर शुरू,

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जांजगीर चांपा। जिले में नगर पालिका परिषद की स्थिति पर नजर डाले तो जिले में पार्षदों को मिलने वाली निधि के उपयोग वार्ड की उपयोगिता के ऊपर की जाती है। जरूरी नहीं कि सभी वार्ड एक जैसे ही हो कहीं कम या कहीं ज्यादा की स्थिति बनती है लेकिन जब निधि की बात आती है तो पालिका में प्रत्येक पार्षद को लगभग 4 से 5 लाख रुपए पार्षद निधि दी जाती है। जिसका उपयोग वार्ड की समस्याओं को ध्यान में रखकर उपयोग किया जाना होता है।

वहीं पार्षद निधि के उपयोग नहीं होने पर पार्षदों से पूरी जानकारी लेकर उसका लेखा जोखा तैयार किया जाता है। पार्षद निधि के उपयोग करना अत्यंत आवश्यक है अपने वार्ड को छोड़कर बाकी वार्डो पर ध्यान देना कहा तक लाजिमी है। वही किसी वार्ड में अगर फंड की कमी होती है तब दूसरे पार्षद निधि का उपयोग किया जा सकता है। यह निर्भर करता है कि उस निधि का उपयोग संबंधित अधिकारी के स्वविवेक द्वारा कराया जा सकता है। लेकिन वार्ड के पार्षद निधि का उपयोग वार्ड में ही होना चाहिए।

क्या यह दुरुपयोग नहीं है? क्या इसका पूरा उपयोग वार्ड में ही होना चाहिए या नहीं? पार्षद उस निधि का उपयोग वार्ड में क्यों नहीं कर पाता? क्या वार्ड की जनता को वार्ड में समाधान नहीं मिलना चाहिए। इन बातों की कुछ जानकारी सूचना के अधिकार से ली गई। लेकिन क्या पार्षदों की निधि से वार्ड का रख रखाव व्यवस्थित है या सिर्फ खानापूर्ति के नाम पर वार्ड की जनता को धोखा दिया जा रहा है। चुनाव के बाद क्या स्थिति सुधरेगी या नए पार्षद द्वारा भी वार्ड की जनता को धोखा दिया जाएगा। वार्डो की स्थिति के जिम्मेदार आखिर कौन? चुनाव के समय नए नए वादों का जखीरा खुलने वाला है? अगर जनता जाग नहीं पाई तो अगले 5 साल तक दोबारा यही स्थिति रहेगी। फिलहाल चुनाव की सारी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है कल से सभी प्रत्याशी अपने प्रचार में व्यस्त हो जाएंगे।

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