वासु सोनी (तीर कमान)। अब ये क्या सुन लिया। कोसा, कांसा, कंचन नगरी में ऐसा क्या आफत आ गया। कुछ दिन पहले वर्दी वाले एक बड़े साहब आए थे। ऐसा लग रहा था कि नगर का माहौल हमेशा ठीक रहेगा। लेकिन धुंए उड़ाने वाले चिमनियों के मामले में गर्दा उड़ रहा गया। जिले के वर्दी वाले बड़े साहब लगातार परेड उपर परेड ले रहे हैं, जरा सा किसी ने सुना दिया, समझो बरसात ही बरसात, सीधे लाइन… अब दो तीन जगहों के बारे में जिले के बड़े वर्दी वाले साहब को किसी ने बता दिया कि लेन-देन नामक बहरूपिया बैंकों के बजाए आजकल थाने के आसपास भटक रहा है। फिर क्या बड़े साहब भी ठान लिए, दिख तो जाए… सुनने में तो यह भी आया कि लेन-देन बहरूपिया कोसा, कांसा, कंचन नगरी में रोजाना दिख रहा है, अब उपर से किसी ने साहब को बता दिया, साहब देख तो ऐसा हो रहा, बरसात में पानी ज्यादा मांगा जा रहा…फिर क्या साहब ने सीधे लेटर… समझ तो गए होंगे, वो भी दूसरी जगह का…अब क्या? चला रिफरेंश उपर रिफरेंश का दौर… ले देकर कैंसिल हो गया…लेकिन बरसात ऐसी हो रही है कि हर कोई कह रहा है बिना बरसात के नाव नहीं चलेगी…पर जिले के बड़े साहब ने तो ठान रखी है नाव तो चलेगी लेकिन बिना पानी और बिना बरसात के वर्ना…समझ तो गए होंगे साहब जो ठहरे…

